Saturday, 20 February 2021
🌺🌺 नया जन्म - ( भाग 9 ) 🌺 🌺
एक नौसिखिया लिखंतु : बचपन से पढ़ने का कीड़ा था मन में इसलिए अख़बार, पत्र-पत्रिकाओं से लेकर माता श्री के उपन्यास तक... सब पढ़ डालते थे। इसी पढ़ने के शौक ने लिखने को प्रेरित किया... ✍️
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Monday, 15 February 2021
🥀🥀 समर्पण 🥀🥀
एक नौसिखिया लिखंतु : बचपन से पढ़ने का कीड़ा था मन में इसलिए अख़बार, पत्र-पत्रिकाओं से लेकर माता श्री के उपन्यास तक... सब पढ़ डालते थे। इसी पढ़ने के शौक ने लिखने को प्रेरित किया... ✍️
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Saturday, 30 January 2021
🌺🌺 नया जन्म - भाग 8 🌺🌺
गुड इवनिंग मरियम....
गुड इवनिंग ममता सिस्टर, आप इस वक्त यहां.... आपकी तो कल मार्निंग शिफ़्ट है ना !!!!
हां.... वो दरअसल अनाहिता के लिए खाना लाई थी और कल उसे डिस्चार्ज भी करवाना है तो सोचा आज रात यहीं रूक जाती हूँ।
अनाहिता से याद आया सिस्टर... उसके बगल वाले रूम में जो शर्मा जी एडमिट थे ना, उनके भाई आज अनाहिता के पेरेंट्स के बारे में पूछ रहे थे।
क्यों.....???
पता नहीं.... पर जैसे ही मैंने बताया, बहुत उदास हो गये।
अच्छा..... ठीक है, देखती हूँ।
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प्राइवेट वार्ड, जिसे कोरोना वार्ड में तब्दील कर दिया गया था। उसके स्टाफ़ रूम में कुसुम सिस्टर और विभा सिस्टर बहुत गंभीर मुद्रा में बैठी थीं।
गुड इवनिंग विभा, गुड इवनिंग कुसुम....
अरे ममता दीदी आप.... आपकी तो कल की शिफ़्ट है ना...!!!
हां भाई, कल की ही शिफ़्ट है। पहले मुझे दो मिनट सुकून से बैठने तो दो और तुम लोग भी बैठ जाओ, फिर करना सवाल - जवाब।
हे भगवान! आज तो बहुत थक गई मैं। इस मुए कोरोना की वजह से सारे ट्रांसपोर्ट बंद हो गए हैं, पैदल ही आना-जाना पड़ा मुझे। ऊपर से ये रास्ते में पुलिस वालों ने बहुत परेशान किया। बार - बार बताना पड़ रहा था कि भाई, हाॅस्पिटल स्टाफ़ हूँ, ड्यूटी करके लौट रही हूँ। बिना आई कार्ड दिखाए, मान ही नहीं रहे हैं। कसम से, इतने इंट्रो तो मेरे स्कूल से लेकर काॅलेज तक में नहीं हुए जितना आज सुबह जाने और शाम को आने में हुए हैं।
एक तो बिल्कुल भी रेस्ट नहीं मिल पाया, शायद इसीलिए हरारत सी लग रही है। यहां से जाने के बाद भी सारा दिन घर के कामों में और अनाहिता के लिए रूम प्रिपेयर करने में लग गया।
अनाहिता के लिए रूम प्रिपेयर करने में मतलब.... विभा सिस्टर ने आश्चर्य से पूछा।
अरे हाँ, मैं तुम लोगों को बता ही नहीं पाई। दरअसल अब अनाहिता पहले से काफ़ी बेटर है और ये कोरोना का चक्कर तो तुम लोग देख ही रहे हो इसलिए मैंने डिसाइड किया है कि अनाहिता अब मेेेरे साथ रहेगी। वो भी काफ़ी एक्साइटेड है.... और सच कहूँ तो अब मैं मेरी बच्ची को लेकर कोई रिस्क नहीं लेना चाहती।
इसका मतलब अनाहिता सच कह रही थी..... मुझे तो लगा कि....!!!!
क्या लगा तुम्हें कुसुम........ तुम दोनों इतनी परेशान क्यों हो ??? जब से आई हूँ, देख रही हूँ.... मैं लगातार बोले जा रही हूँ और तुम दोनों हाँ, हूँ तक नहीं कर रहे हो। बैठ भी नहीं रहे हो।
कोई सिरीयस बात है क्या, अनाहिता ठीक तो है ना...!!!
हाँ दीदी, वो दरअसल सुरेंद्र शर्मा, जो अनाहिता के बगल वाले रूम में एडमिट थे। आज उनकी डेथ हो गई।
ओह..... बहुत बीमार थे बेचारे। सच कहूँ तो अच्छा ही हुआ, मुक्ति मिल गई उन्हें। लेकिन अभी सुबह तक तो स्टेबल थे फिर अचानक से क्या हुआ....!!!!
अच्छा मिo शर्मा से याद आया; रिसेप्शन पे मरियम अभी बता रही थी कि उनके छोटे भाई अनाहिता के पेरेंट्स के बारे में पूछ-ताछ कर रहे थे और पता चलने पर काफ़ी मायूस भी हो गए थे। तुम लोगों को कुछ पता है इस बारे में....!!!!
ओह माई गाॅड, मतलब वो लोग वाकई उसके रिश्तेदार थे...... विभा सिस्टर ने गहरी सांस भरते हुए कहा।
रिश्तेदार थे मतलब...... आख़िर बात क्या है, तुम लोग क्लियर बताते क्यों नहीं..????
विभा और कुसुम सिस्टर ने एक-दूसरे की ओर बेबस नज़रों से देखा। फिर कुसुम सिस्टर ने उन्हें आंखों देखा हाल बता दिया।
हे राम! क्या कसूर है उस फूल सी बच्ची का, जो ये सब झेलना पड़ रहा है उसे.... परेशान हो गईं ममता सिस्टर।
अब मैं एक पल के लिए भी अन्नी को यहाँ नहीं रख सकती। मैं अभी, इसी वक्त उसे लेकर घर जा रही हूँ। पेपर वर्क बाद में भी हो सकता है। दृढ़ कदमों और विचार से खड़ी हो गईं ममता सिस्टर।
रूकिये दीदी, अनाहिता को नींद का इंजेक्शन लगा है। वो सुबह से पहले होश में नहीं आएगी... विभा सिस्टर ने कहा।
कोई बात नहीं, मैं उसे ऐसे ही लेकर जाऊंगी। कल की सुबह मेरी बच्ची अपने घर में आंखें खोलेगी।
कुसुम, मनीष से एंबुलेंस रेडी करने बोलो।
दीदी आप अनाहिता को तब तक कहीं नहीं ले जा सकतीं, जब तक उसकी रिपोर्ट्स निगेटिव नहीं आ जातीं.... कुसुम सिस्टर ने गंभीरता से कहा।
कैसी रिपोर्ट्स कुसुम, क्या हुआ है अनाहिता को...???
मिo नरेंद्र शर्मा की डेथ कोरोना से हुई है। आज सुबह ही उनकी रिपोर्ट आई थी। यही नहीं, उनका परिवार भी कोरोना पाज़िटीव था।
था मतलब.... ममता सिस्टर की भवें सिकुड़ गईं।
जैसा कि मैंने बताया, उनकी पत्नी उसी वक्त एक्सपायर हो गई थीं जब वो अनाहिता के पास थीं। उनके छोटे भाई और उनकी पत्नी को क्वारंटाईन किया गया था। जब शाम को केशव उनकी चाय और नाश्ता लेकर गया तो मिo सुरेंद्र अपनी पत्नी की गोद में सर रखकर लेटे लेटे हुए थे। उन दोनों की आंखें एकटक छत की ओर देख रही थीं।
केशव ने कई बार आवाज़ लगाई पर कोई मूवमेंट न देखकर भागता हुआ हमें बताने आया। बहुत ही दिल दहलाने वाला नज़ारा था दीदी। वो दोनों भी......
अभी दो घंटे पहले उन सबकी रिपोर्ट आई है। उनका पूरा परिवार कोरोना पाज़िटीव था और वो सभी अनाहिता के क्लोज़ काॅन्टैक्ट में थे इसलिये अनाहिता भी कोरोना सस्पेक्ट है।
नहीं..... सुनते ही लड़खड़ा गईं ममता सिस्टर।
मिo शर्मा के इलाज में जितने भी स्टाफ़ उनके काॅन्टैक्ट में आए थे, वो सब कोरोना सस्पेक्ट हैं, आप भी दीदी..... आख़िरी शब्द बहुत मुश्किल से कह पाईं कुसुम सिस्टर।
इन शब्दों ने ममता सिस्टर की सारी उम्मीदों, सारे सपनों को तोड़ कर रख दिया। वो बेजान-सी हो गईं।
दीदी, संभालिये खुद को.... कुसुम और विभा सिस्टर के मुंह से एकसाथ ये शब्द निकले पर इस बीमारी के ख़ौफ़ ने उन्हें ममता सिस्टर को संभालने को आगे बढ़ने से रोक दिया।
दीदी प्लीज़, ऐसे हिम्मत मत हारिये। आप तो हम सबके लिए मिसाल हैं। जब भी कभी टूटते हैं तो आपको याद करके फिर से खड़े होने की ताकत मिलती है। अगर आप ही ऐसे निराश हो जाएंगी तो अनाहिता को कौन संभालेगा...!!!!
विभा मुझे अन्नी से मिलना है.... बस एक बार, प्लीज़। हाथ जोड़कर विनती करते हुए ममता जी ने कहा।
ये आप क्या कर रही हैं दीदी..... आप तो खुद एक नर्स हैं, अच्छे से जानती हैं ये सारी सिचुएशन। होश में आईए...... इस वक्त अनाहिता से मिलना आप दोनों के लिए जान के लिए ख़तरा बन सकता है।
तुम सही कहती हो विभा, मैं मेरी बच्ची से मिल तो नहीं सकती पर उसे दूर से देख तो सकती हूँ ना, प्लीज़..... आंखों में आंसू भरे हुए ममता जी ने दोबारा विनती की।
इस वक्त एक सिस्टर इंचार्ज पर माँ हावी थी और माँ की पुकार तो भगवान भी नहीं टाल पाया..... ये तो फिर भी इंसान थे।
आइए दीदी, पर आप किसी भी चीज़ को टच नहीं करेंगी और ना ही अनाहिता के रूम में जा सकती हैं। आपको दरवाज़े से ही देखना होगा उसे.... कुसुम सिस्टर ने कहा।
भारी मन से उठीं ममता जी पर चक्कर आ गया और फिर से चेयर पर बैठ गईं। उनकी ये हालत देखकर दोनों सिस्टर की आंखें भी नम हो गईं।
कुछ देर के लिए सब ठहर सा गया। थोड़ी देर बाद अपनी बची-खुची ऊर्जा समेट कर ममता जी फिर खड़ी हुईं..... चलो कुसुम।
जो ममता सिस्टर अपनी तेज़ चाल के लिए पूरे हाॅस्पिटल में प्रसिद्ध थीं, आज किसी वृद्ध की भांति धीरे-धीरे चल रही थीं।
उन्होंने दरवाज़े के कांच से देखा, अनाहिता गहरी नींद में थी। सोते हुए कितनी मासूम लगती है ना मेरी बच्ची, कुसुम...... हाँ दीदी, दूर खड़ी कुसुम सिस्टर ने आंसू रोकते हुए जवाब दिया।
आप चिंता मत कीजिए, हम कुछ नहीं होने देंगे आप दोनों को। पूरा हाॅस्पिटल जान लगा कर आप दोनों की सेवा करेगा। अब तक आपने हम सबको बड़ी बहन की तरह संभाला है, अब हमारी बारी है अपना फर्ज़ निभाने की। ये वादा है हमारा आपसे....
मेरी अन्नी का ख़्याल रखना कुसुम...... आंखों से ही अनाहिता को चूमकर मुड़ गईं ममता जी।
उधर नहीं, इस तरफ़ चलिये दीदी..... आपका भी सैंपल लेना है। बिना कुछ कहे ममता जी सर झुकाए उस दिशा में चल दीं।
दिनेश, स्टाफ़ रूम और ये सब तुरंत सैनिटाइज़ करो.... पीछे आ खड़े वार्डब्वाॅय को इंस्ट्रक्शन देकर कुसुम सिस्टर ममता जी के साथ हो लीं।
उनका सैंपल लेकर और एडमिट कर जब वापस लौटीं तो विभा सिस्टर को सर झुकाए बैठा पाया।
दीदी को 101 डिग्री फ़ीवर है विभा। उनके सिम्प्टम दिखने शुरू हो गए हैं।
सुनते ही विभा सिस्टर चौंक पड़ी। ये सब क्या हो रहा है कुसुम..... अपने पंद्रह साल के कैरियर में मैंने खुद को इतना बेबस और लाचार कभी महसूस नहीं किया। बीमारियाँ पहले भी आईं, लोग बीमार हुए। कई जान से भी गए पर तब इतना बंधा हुआ फ़ील नहीं किया जितना आज कर रही हूँ।
मेरी ममता दीदी, मेरे आगे रो रही थीं, हाथ जोड़कर विनती कर रही थीं पर मैं उन्हें बढ़कर गले नहीं लगा सकी, उन्हें ढांढस नहीं बंधा सकी कि दीदी, आप फ़िक्र मत किजिए। हम सब हैं आपके साथ.....
तुम जानती हो ना कुसुम, उन्होंने मेरे लिए क्या कुछ नहीं किया है और मैं, मैं कुछ नहीं कर पा रही हूँ उनके लिए..... फूट-फूटकर रो पड़ीं विभा सिस्टर।
इतनी देर से खुद को पत्थर किये बैठीं कुसुम सिस्टर के जज़्बात भी आंखों के रास्ते बह निकले।
ये वही स्टाफ़ रूम है जो कभी स्टाफ़ नर्सेज़ की हँसी से गुलज़ार हुआ करता था। कभी ओवर देते वक्त सीरियस हो जाता था तो कभी गुपचुप गाॅसिप का केंद्र बन जाता था। मगर आज यहां सन्नाटा पसरा है....... मौत का सन्नाटा............
✍️✍️ प्रियन श्री ✍️✍️
एक नौसिखिया लिखंतु : बचपन से पढ़ने का कीड़ा था मन में इसलिए अख़बार, पत्र-पत्रिकाओं से लेकर माता श्री के उपन्यास तक... सब पढ़ डालते थे। इसी पढ़ने के शौक ने लिखने को प्रेरित किया... ✍️
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Wednesday, 13 January 2021
🍃🍃 सुकून 🍃🍃
एक नौसिखिया लिखंतु : बचपन से पढ़ने का कीड़ा था मन में इसलिए अख़बार, पत्र-पत्रिकाओं से लेकर माता श्री के उपन्यास तक... सब पढ़ डालते थे। इसी पढ़ने के शौक ने लिखने को प्रेरित किया... ✍️
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Sunday, 10 January 2021
🌺🌺नया जन्म - भाग 7🌺🌺
अंदर ही अंदर जाने क्या मुझे खाए जा रहा था। कुछ देर तक यूहीं बैठे रहने के बाद मैं दीवार के सहारे खड़ी हुई। दरवाज़ा खोला और बाहर काॅरिडोर में आ गई। कुछ दूर बेंच पर वही दोनों लोग बैठे थे जो कुछ देर पहले मेरे दरवाज़े पर थे। उनके बीच शून्य की ओर ताकती एक वृद्धा बैठी थीं। एक ज़माने में ये मेरा परिवार हुआ करता था। मैंने अपनी मुट्ठियां भींच रखी थीं, जैसे खड़े रहने की सारी ताकत उन्हीं से मिल रही हो।
अनाहिता, तुम बाहर क्या कर रही हो...!!!! अंदर जाओ.....
कुसुम सिस्टर की आवाज़ सुन मैं चौंक गई।
अनाहिता..... ये नाम सुनकर उस निष्प्राण देह वृृद्धा की पलकें झपकींं। आवाज़ की विपरीत दिशा में देखते ही उनका चेहरा सफेद पड़़ गया। हम दोनों एक-दूसरे को निर्निमेष देख रहे थे। सहसा वो उठीं और तेज़ कदमों से मेेरी तरफ़ बढ़ीं। बिल्कुल पास आकर उन्होंने मेरा चेहरा अपने हाथों में भर लिया। बहुत कुछ भरा था उनकी आंखों में..... जो मुझे गले लगाते ही बांध तोड़ कर बह चला। मैंने मुट्ठियां और कस कर भींच लीं।
अन्नी...... मेरी अन्नी..... तू मेरी अन्नी है ना....!!!!!
बिल्कुल मेरे महेंद्र का चेहरा पाया है तूने। तभी तो देखते ही पहचान लिया मैंने..... वो लगातार रोये जा रही थीं।
नरेंद्र, मनोरमा.... देखो, हमारी अन्नी।
वो दोनों हैरानी से हमें देखे जा रहे थे। केवल वही नहीं, आसपास काफ़ी लोग जुट गए थे।
अन्नी.... तूने पहचाना मुझे। मैं तेरी बड़ीमम्मा.... वसुंधरा। ये तेरी बड़ीमम्मा मनोरमा और ये बड़ेपापा नरेन्द्र। बेटा कुछ याद आया....!!! बोल न बेटा.... तू कुछ बोलती क्यों क्यों नहीं ???
वो झिंझोड़े जा रही थीं और मैं बुत बनी खड़ी थी। जैसे होंठ सिल गए हों, आंखें पथरा गईं हों और शरीर बेजान हो गया हो। न उनकी दयनीय हालत पर रोना आ रहा था और न उनकी बर्बादी पर हंसी। कायदे से तो मुझे उन्हें दुनिया - समाज के सामने ज़लील करना चाहिए था..... पर शरीर के साथ - साथ मन भी शून्य हो गया था।
नरेंद्र, मनोरमा... देखो ना, ये कुछ बोलती ही नहीं। बेटा तू मुझे नहीं पहचान पा रही है पर मैंने तुझे पहचान लिया है। तू मेरी ही अन्नी है.... वो रोते - रोते अचानक मेरे पैरों में गिर पड़ीं। मेरी मुट्ठियां और कस गईं।
मुझे माफ़ कर दे अन्नी.... मुझे माफ़ कर दे। मैंने तुझे तेरे ही घर से बाहर निकाल दिया मेरी बच्ची। तेरे साथ हमने जो अन्याय किया, देख उसकी सज़ा हम सबको मिल गई। घर बिक गया, बिज़नेस चौपट गया.... और जिन बेटों के लिए तेरा हक़ छीना, वो बेटे भी दुश्मन हो गए अन्नी। हम बर्बाद हो गए अन्नी, हमें माफ़ कर दे....!!!! बोलते - बोलते वो बेहोश हो गईं।
भाभी.... अब तक जो बड़ीमम्मा और बड़ेपापा हैरान-परेशान हो हमें देख रहे थे, वो उन्हें संभालने के लिए भागते हुए आए।
सिस्टर देखिये ना, क्या हो गया भाभी को...!!!! मदद कीजिए प्लीज़....
कुछ देर तक वो लोग यूंही उन्हें होश में लाने की कोशिश करते रहे, मदद मांगते रहे और मैं मूर्तिवत् खड़ी रही। कोई भी आगे नहीं आया। कुछ देर बाद प्लास्टिक के कपड़े पहने कुछ लोग आए और उन्हें स्ट्रेचर पर ले गए। बड़ीमम्मा और बड़ेपापा भी उनके पीछे - पीछे चले गए।
उनके जाने के बाद कुसुम सिस्टर ने मुझे दोबारा कमरे में जाने को कहा। वो मुझसे कुछ दूर खड़ी थीं फिर दिखनी बंद हो गईं..........
मुझे उलझन सी महसूस हो रही थी। ठीक से सांस नहीं ले पा रही थी। एक झटके से उठ बैठी मैं।
कौन है..... सामने नीली प्लास्टिक के कपड़े पहने शख़्स को देख मैं ज़ोर से चीखी।
ईज़ी अनाहिता... मैं हूँ, कुसुम सिस्टर। वो थोड़ा पीछे हटते हुए बोलीं।
सिस्टर.... आप.... ये.... ये क्या पहन रखा है आपने और मैं तो बाहर काॅरिडोर में थी, यहां कैसे....!!! सर में फिर से दर्द शुरू हो गया था मेरे।
रिलैक्स अनाहिता..... ये पीपीई है, कोरोना से बचाव के लिए। बाहर बेहोश हो गई थी तुम।
पर आप मेरी नाक.... कर क्या रही थीं मुझे....????
सैंपल ले रही थी, कोरोना टेस्ट के लिए।
क्या..... पर क्यों....!!! मैं झुंझला गई।
शांत हो जाओ अनाहिता। तुम्हारे बगल वाले कमरे में जो डेथ हुई है.... मिo सुरेंद्र शर्मा, वो कोरोना पाॅज़िटीव थे। हमारे शहर का पहला कोरोना केस है ये.... वो भी पहली कोरोना पाॅज़िटीव डेथ का। पूरे हाॅस्पिटल में हडकंप मचा हुआ है। जितने भी लोग उनके काॅन्टैक्ट में रहे हैं, सबके टेस्ट हो रहे हैं।
पर मैं तो उनसे मिली भी नहीं.... देखा तक नहीं उन्हें। मैं बुरी तरह चौंक गई।
पर उनकी फ़ैमिली पूरे समय उनके साथ थी इसलिए वो सभी कोरोना सस्पेक्ट हैं। उनके भी सैंपल गए हैं टेस्ट के लिए और अभी काॅरिडोर में जिस तरह उनकी पत्नी तुम्हारे साथ.... मेरा मतलब है तुम्हारे काफ़ी क्लोज़ कान्टैक्ट में थीं इसलिए अब तुम भी सस्पेक्ट हो। बाई द वे अब तुम होश में आ गई हो तो प्लीज़ कोआपरेट करो। तुम्हारी नाक से सैंपल ले लिया है। अब मुंह खोलो, गले से स्वाब सैंपल लेना है।
मैं भौंचक्की सी उन्हें देखे जा रही थी। अब समझ आया कि इसीलिए कोई मदद करने को आगे नहीं आ रहा था बड़ीमम्मा की। सिस्टर थोड़ा पास आ गईं सैंपल लेने के लिए।
अच्छा अनाहिता, तुम दोनों सेम सरनेम शेयर करते हो ना... शर्मा, राईट?? क्या सच में वो तुम्हारे रिश्तेदार हैं...!!!
मुझे उबकाई आ गई। पता नहीं उनके सैंपल लेने से या उनके सवाल से...!!!
तभी दरवाज़ा खुला और..... भाभी नहीं रहीं अन्नी। बड़ीमम्मा और बड़ेपापा रोते हुए कमरे में दाख़िल हुए।
अरे रूकिए प्लीज़...... आप लोग ऐसे बाहर नहीं घूम सकते। कहाँ जा रहे हैं रूकिए....!!!! उनके पीछे कुसुम सिस्टर की ही तरह पीपीई किट पहने दो और लोग भागे चले आ रहे थे लेकिन उन लोगों को तो जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था।
अपने किए का प्रायश्चित करके वो मुक्त हो गईं अन्नी। तुम्हें देखते ही पहचान लिया था उन्होंने और जाने से पहले माफ़ी भी मांग ली। अब हमें भी मुक्त कर दो अन्नी। बहुत बुरा सुलूक किया हमने तुम्हारे साथ बच्ची। हमें माफ़ कर दो। वो ज़ार-ज़ार रोये जा रहे थे और रोते-रोते पैर पकड़ लिए मेरे।
मैं फिर से स्तब्ध हो गई। पैर खींचना चाह रही थी पर खींच नहीं पा रही थी। मेरी ये हालत देख बड़ी मुश्किल से वो लोग उन्हें बाहर लेकर गए।
रिलैक्स अनाहिता, तुम्हारी हालत ठीक नहीं है। आराम की सख़्त ज़रूरत है। डाॅo चौहान ने तुम्हें नींद का इंजेक्शन देने को कहा है। अब तुम रेस्ट करो। जैसे ही तुम्हारी रिपोर्ट आती है, तुम्हें बता दिया जाएगा..... सिस्टर ने इंजेक्शन लगाते हुए कहा।
नींद की दवा क्यों..... मुझे अभी नहीं सोना। मुझे मम्मा से मिलना है। वो बस आती ही होंगी थोड़ी देर में... मैं परेशान हो गई।
टेक रेस्ट अनाहिता, यू रियली नीड इट.... वो कहकर चली गईं।
नहीं, मुझे नहीं सोना। मुझे मम्मा से मिलना है। मैं बड़बड़ाते हुए अपना फ़ोन ढूंढने लगी। डायल लिस्ट खोली और मम्मा का नंबर डायल करना चाहा पर स्क्रीन धुंधली नज़र आने लगी। मैं ज़बरदस्ती आंख खोलने की कोशिश कर रही थी पर.......
धीरे-धीरे मैं गहरी नींद की आगोश में चली गई। फ़ोन मेरे हाथ में अब भी था, जिसमें लास्ट डायल ममता सिस्टर शो कर रहा था।
✍️✍️प्रियन श्री ✍️✍️
एक नौसिखिया लिखंतु : बचपन से पढ़ने का कीड़ा था मन में इसलिए अख़बार, पत्र-पत्रिकाओं से लेकर माता श्री के उपन्यास तक... सब पढ़ डालते थे। इसी पढ़ने के शौक ने लिखने को प्रेरित किया... ✍️
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Saturday, 2 January 2021
🌺🌺 नया जन्म - (भाग 6) 🌺 🌺
हर तरफ़ अफ़रा - तफ़री का माहौल था। एक अनजानी सी बीमारी ने देश और दुनिया में पैर पसारना शुरू कर दिया था। स्थिति भयावह से विस्फोटक हो चली थी। लोग मर रहे थे और ये संख्या हर पल दूनी होती जा रही थी। दुनिया भर की सरकारें इस बीमारी से बचाव के के लिए हर संभव प्रयास कर रही थीं। उनमें से एक लाॅकडाउन भी था, जो एक तरह से बिल्कुल नया था हम सबके लिए.... ।
हमारे देश में हालात फिर भी बेहतर थे; पर दुनिया के कई देशों में इस बीमारी ने तांडव करना शुरू कर दिया था... मौत का तांडव। सामान्य सर्दी-जुकाम की तरह शुरू होने वाली ये बीमारी जल्द ही सांस लेने की तकलीफ़ में बदल जाती। जब तक समझ आता, बहुत देर हो जाती। इस बीमारी का सबसे दर्दनाक पहलू ये था कि लोग अपने प्रियजनों को आख़िरी बार न तो देख सकते थे और न ही उनका अंतिम संस्कार कर सकते थे।
इस बीमारी को वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस नाम दिया। कोरोना पर पिछले कई दिनों से ख़बरें आ रही थीं पर मैं खुद में ही इतनी गुम थी कि दीन - दुनिया से बेख़बर रहती थी। टीवी पर चलती ख़बरों से हर पल एक नई जानकारी सामने आती। उन्हीं में से एक न्यूज़ से मेरा माथा ठनका। कई सालों पहले फैले एक जानलेवा सार्स वायरस.... और कोरोना --- एक ही प्रजाति के वायरस हैं।
धुंधली सी कुछ यादों ने मुझे आ घेरा। ये वही वायरस था जिस पर मेरे पापा रिसर्च कर रहे थे और इसी की वजह से हमारी हंसती-खेलती ज़िन्दगी जल कर ख़ाक हो गई। मेरा जी घबराने लगा। क्या वही मौत का तांडव फिर से शुरू होने वाला है...???
मैं मां का इंतज़ार करने लगी। अब मैं फिर से अकेली नहीं होना चाहती थी.... लेकिन कल की नाइट शिफ्ट के बाद क्या आज वो आएंगी..!!! तभी मेघना सिस्टर मेरी दवाईयां लेकर आईं।
मम्मा कब आएंगी....!!! मैं झट से पूछ बैठी।
उनके माथे की सिलवटों को देख मुझे होश आया।
मेरा मतलब है ममता जी की आज कौन सी शिफ्ट है..??
आज उनकी छुट्टी है। अब वो कल सुबह आएंगी ---- लेकिन पता नहीं आज घर कैसे गई होंगी..!!! वो अनमनी सी हो गईं।
क्या मतलब, घर कैसे गई होंगी...???
अभी सुबह ही तो बताया था कि लाॅकडाउन लग गया पूरे देश में। लाॅकडाउन मतलब सब कुछ बंद..... न बाज़ार, न दुकानें, न स्कूल - काॅलेज, न दफ़्तर और न ही गाड़ी - मोटर; सब बंद..... पैदल ही जाना पड़ा होगा।
पता तो रात को ही चल गया था, पर ममता दीदी बहुत खुश थीं.... बहुत दिनों बाद इतनी खुश थीं, तुम्हारे साथ...। उनका ये स्पेशल डे बर्बाद नहीं करना चाहती थी इसीलिए नहीं बताया।
अरे हाँ, ये लो तुम्हारा फ़ोन। दीदी ने मुझे बनवाने के लिए दिया था। मैंने उनका नंबर भी सेव कर दिया है इसमें... कहते हुए मुस्कुरा दीं वो।
थैंक्यू... जवाब के साथ मैं भी मुस्कुरा उठी।
सालों से चलती आ रही मेरी सीधी-सपाट ज़िन्दगी इन दिनों उस आकाश झूले की तरह हो गई थी, जो पलक झपकते ही कभी ऊपर जाता था, तो कभी नीचे.... । पहले मेरा एक्सीडेंट, फिर मम्मा का आना; और अब ये कोरोना। अभी जाने और क्या-क्या होना बाकी है...!!!!
बस दिल से एक दुआ निकलती, कि अब और बुरा नहीं...।
मेघना सिस्टर के जाने के बाद मैंने कांपते हाथों से मम्मा का नंबर डायल किया। रिंग की आवाज़ के साथ जाने क्यों दिल ज़ोरों से धड़कने लगा..!!!
हैलो.... मम्मा की आवाज़ थी।
मन अथाह भावों से भर उठा पर शब्द एक भी न निकला।
हैलो.... दुबारा आवाज़ आई।
मम्मा.......
अन्नी बेटा, तुम्हारा फोन ठीक हो गया...!! मैं अभी मेघना को फोन करके थैंक्यू बोलूंगी।
मम्मा आप कब आओगे, मुझे अच्छा नहीं लग रहा। बहुत याद आ रही है आपकी.... बोलते - बोलते मैं रूआंसी हो गई।
उदास नहीं होते मेरा बच्चा, मैं आती हूँ ना शाम को।
पर आपकी तो कल सुबह की शिफ्ट है ना....। आप कैसे बार-बार ट्रैवेल करेंगी, पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी तो बंद हो गए हैं...!!!!
अरे बाबा रे... इतनी फ़िक्र। आपकी मम्मा बहुत स्ट्रांग है बच्चा। वैसे भी, मैं रात को आपके पास ही रुकूंगी। पैकिंग भी तो करनी है आपकी ; और सुबह डिस्चार्ज पेपर भी बनवाने हैं ताकि कल की ड्यूटी करके आपको साथ ही लेकर घर लौट सकूं।
घर.... मुझे मेरे कानों पर यकीन ही नहीं हो रहा था लेकिन मम्मा की बातों में अधिकार की आभा साफ़ झलक रही थी।
हां बच्चा, अब आपकी तबियत बहुत बेहतर है। अब घर पे आराम करना है बस....। कुछ वक्त बाद आप बिल्कुल ठीक हो जाओगे। आप आओगे ना बच्चा..... मम्मा के पास रहने ???
मैं..... आपके साथ.... घर...... सच मम्मा....!!!!! मैं रोने-रोने को हो आई।
हां बच्चा, अब मैं आपको कभी भी खुद से दूर नहीं जाने दूंगी। हमेशा अपने आंचल में छुपा के रखूंगी अपनी अन्नी को....
आप रोना नहीं मेरा बच्चा.... मम्मा जल्दी से आती है आपके पास। ओके...!!!!
ओके मम्मा...... फोन रखते ही मैं रो पड़ी।
ज़िन्दगी भी क्या शै है.....!!! कभी एक झटके में सब छीन लेती है, तो कभी पल में इतना कुछ दे देती है कि दामन छोटा पड़ जाए। एक बिन माँ की बच्ची को माँ मिल जाए तो ज़माने भर की दौलत कम है उसके आगे। मेेरा का हाल भी कुछ ऐसा ही था।
आजकल पांव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे..... बिल्कुल हवा में उड़ रही थी मैंं ; सच में..... इतनी खुश थी, इतनी खुश..... कि कोरोना, लाॅकडाउन कुछ याद ही नहीं रहा। कल मैं घर जाऊंगी; अपने घर.... जैसे सदियाँ बीत गई हों घर में कदम रखे।
अपनी खुशियां संभाल कर रखने की कोशिश कर ही रही थी कि ज़ोर - ज़ोर से रोने की आवाज़ सुनकर मेरी तंद्रा टूटी। मुझसे रहा नहीं गया इसलिए उठकर दरवाज़े को थोड़ा सा खोलकर खड़ी हो गई। शोर सुनकर पता चला कि मेरे बगल वाले कमरे में एडमिट मरीज़ नहीं रहे...।
मैं उदास हो गई। किसी अपने को खोने का दर्द मैं अच्छी तरह समझती हूँ। चुपचाप आकर बेड पर लेट गई। ऐसे समय में लोगों को सांत्वना देना मेरे लिए बहुत मुश्किल भरा होता है। जो चीज़ें मैं खुद आजतक नहीं समझ पाई, वो किसी और को कैसे समझाऊं....!!!!!
बहरहाल मैं फिर से घर के सपने देखने लगी। जहां मैं और मम्मा साथ-साथ रहेंगे। मम्मा ने ये तो कहा कि वो शाम को आएंगी पर कितने बजे तक.... ये तो उन्होंने बताया ही नहीं। फोन करके पूछूं क्या..!!! नहीं-नहीं.... बेचारी थक गई होंगी और फिर डिनर भी तो बनाना होगा उन्हें। ज़रूर मेरे लिए कुछ स्पेशल बना रही होंगी। उन्हें डिस्टर्ब नहीं करूंगी।
मम्मा का घर कितनी दूर होगा यहां से.... पैदल आने-जाने में वक्त भी तो लगता है। इसी उधेड़बुन में व्यस्त थी कि दरवाज़े से आती खुसुर-फुसुर ने मेरा ध्यान खींचा। वैसे लोगों की बातें छुपकर सुनना पसंद नहीं मुझे; पर न जाने किस ख्याल में धीमे कदमों से बिना आहट किये दरवाज़े से कान लगा कर खड़ी हो गई।
ये क्या पाप-पुण्य का रोना लेकर बैठ गई तुम भाभी के सामने... हालत देखी रही हो उनकी, ये वक्त है इन बातों का...!!!!! सब कुछ लुट गया उनका और तुम....
उनका सब लुट गया और हमारा.....हमारा क्या बचा है नरेंद्र ?? क्या अब तक आपकी आँखें नहीं खुलीं !!! ये हमारे पापों का फल है जो हमने, हम सबने मिल कर किया था। हमारी फूल सी बच्ची जो हमें बड़ीमम्मा-बड़ेपापा कहते नहीं थकती थी, उसे हमने...... इतना बड़ा घर-परिवार होते हुए भी कोई अपना न हो सका उसका।
सच कहते हैं, माँ-बाप से बढ़कर कोई सगा नहीं होता। उस बेचारी नन्हीं-सी जान के सर से माँ-बाप का साया क्या उठा..... उसके सो काॅल्ड अपने ही दुश्मन हो गये। जिस धन-संपत्ति के लिए हमने ये पाप किया, वो सब उसके पिता की ही तो देन थी। क्या थे आप दोनों भाई..... छोटे - मोटे व्यापारी !!! उसने अपने खून-पसीने की कमाई से आपको इतने बड़े बिज़नेस का मालिक बनाया, महल जैसा घर बनवाया जिसमें वो साल के केवल कुछ दिन ही रह पाता था..... क्योंकि घर की स्थिति सुधारने के लिए वो बेचारा विदेश में पड़ा था।
हमसे बड़ा एहसान फ़रामोश और कौन होगा दुनिया में....!!! जिस भाई ने चार पैसे का आदमी बनाया, समाज में रूतबा और इज़्ज़त दिलवाई उसी के साथ इतना बड़ा धोखा करते हमारी रूह भी नहीं कांपी.... और देखिये ना क्या बचा हमारे पास..???? वो महल जैसा घर बेचकर हमें यहां आना पड़ा।
जिन बेटों के लिए हम ये पाप कर रहे थे, वो भी हमें छोड़कर चले गए। पहले भाईसाहब का बड़ा बेटा ज्यादा लाड़-प्यार में गलत सोहबत की बलि चढ़कर, जरायम की दुनिया में खो गया। फिर छोटे बेटे को पैरालिसिस हो गया। चार साल तक बेड पर रहा और एक दिन भगवान को उस पर तरस आ गया। हमारे अपने दोनों बेटे..... वो कब तक हमारे गुनाहों से बचे रहते..!!! जानते हैं उस कार एक्सीडेंट में हम क्यों बच गये..... क्योंकि अभी तक हमने अपने पापों का प्रायश्चित नहीं किया है।
भाईसाहब भी दिल पर बोझ लेकर ही गये हैं नरेंद्र..... और दीदी, मैंने देखा है उनकी आंखों में पछतावा। अपने घर की लक्ष्मी को अपने हाथों ही धक्के मारकर बाहर निकाल देने का पछतावा। वो सिर्फ़ बेटी नहीं थी हमारे घर की.... श्री थी। केवल धन-दौलत ही नहीं, सुख-शांति और खुशहाली भी उसी से थी। उसी लक्ष्मी को हमने अनाथाश्रम भेज दिया।
तुम ठीक कहती हो मनोरमा। दिल के एक कोने से हर वक़्त आवाज़ आती थी कि..... पर मेरी आंखों पर अहंकार जो पर्दा पड़ा था, वो मुझे ये सब स्वीकार ही नहीं करने देता था। पता नहीं हम भी कभी प्रायश्चित कर पायेंगे या भाईसाहब की तरह ही एड़ियां रगड़ते हुए......।
मनोरमा, नरेंद्र, बड़ीमम्मा - बड़ेपापा, अनाथाश्रम..... ये सारे शब्द एक साथ मेरे जेहन में कौंधने लगे। ज़रा उचककर मैंंने दरवाजे के कांच से उन लोगों को देखने की कोशिश की। अच्छा - ख़ासा वक्त बीत चुका है फिर भी मैंने देखते ही पहचान लिया। भूल भी कैसे सकती हूँ उन्हें......!!! मैं वहीं दरवाजे के पास निढाल होकर बैठ गयी। वो पूरी घटना सजीव हो गई मस्तिष्क में।
यानि वो मेरे बड़ेपापा थे जो अभी..... और ये भी मेरे..... सोचने-समझने की शक्ति ही खो बैठी मैं। अभी थोड़ी देर पहले तक मैं अपने नए घर जाने की खुशी में बावरी हुई जा रही थी और अचानक ही मेरा अतीत सामने आ खड़ा हुआ। ठीक से खुश भी नहीं हो पाई थी कि आंसुओं के सैलाब ने फिर से मुझे डुबो दिया। क्या खुशियों की कोई दुश्मनी है मुझसे..... क्यों वो बस मुझे छूकर गुज़र जाती हैं ???? अब तो खुशियों से भी डर लगने लगा है।
✍️✍️ प्रियन श्री ✍️✍️
एक नौसिखिया लिखंतु : बचपन से पढ़ने का कीड़ा था मन में इसलिए अख़बार, पत्र-पत्रिकाओं से लेकर माता श्री के उपन्यास तक... सब पढ़ डालते थे। इसी पढ़ने के शौक ने लिखने को प्रेरित किया... ✍️
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Saturday, 21 November 2020
💖💖 रात का इंतज़ार 💖 💖
एक नौसिखिया लिखंतु : बचपन से पढ़ने का कीड़ा था मन में इसलिए अख़बार, पत्र-पत्रिकाओं से लेकर माता श्री के उपन्यास तक... सब पढ़ डालते थे। इसी पढ़ने के शौक ने लिखने को प्रेरित किया... ✍️
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Monday, 21 September 2020
🌺🌺 नया जन्म - (भाग 5) 🌺🌺
मेरे मन ने आश्वासन दिया। हाँ, ये वही देवी थी। कभी-कभी कोई अनजान हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण हो जाता हैै..!!! जब तीन दिन की बेहोशी के बाद मेरी आंखें खुली थीं तो वो मेरे लिए स्वर्ग की देवी थीं। फिर पता चला कि मैं हाॅस्पिटल में हूँ और वो यहां की सिस्टर इंचार्ज हैं।
एक नर्स और मरीज़ से कुछ ज़्यादा था हमारे बीच। एक अपनापन, जिसे न पाकर मैं बेचैन हो उठी थी। पर आज जो पता चला, उसने मुझे पूरी तरह बदल दिया। मेरी ज़िन्दगी अब उनकी अमानत है। वो ज़िन्दगी, जिसके बच जाने का मुझे अफ़सोस था।
तभी दरवाज़े की आहट ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। जिसका दो दिनों से इंतज़ार कर रही थी... मेरी स्वर्ग की देवी, वो ममतामयी श्रद्धा की मूरत मेरे सामने खड़ी थी पर जाने मेरे सारे शब्द कहाँ गुम गए...!!! क्या कहूँ, क्या पूछूं.... या उनके चरणों में गिर जाऊँ, कुछ सूझ ही नहीं रहा था....!!!
इतने में वो मेरे पास आकर बैठ गईं। मैं हैरान-परेशान सी बस उन्हें देखे जा रही थी। उनके मुस्कुराते चेहरे ने मुझे मोह-सा लिया और मन अपने-आप ही शांत हो गया। मुझे इस तरह देखकर खुद ही बोलीं - आज मेरी बेटी का जन्मदिन है।
बोलते-बोलते कुछ उदास हो गईं। फ़िर खुद को संयत करके बोलीं - उसे मालपुए बहुत पसंद थे इसीलिए आज बनाए हैं।
चखकर बताओ कैसे बने हैं..... हाथ में लिया टिफ़िन खोलकर मेरी ओर बढ़ाते हुए उन्होंने कहा। फ़िर खुद ही बोलीं - लाओ, आज मैं तुम्हें अपने हाथों से खिलाऊं, कहकर एक टुकड़ा मेरे मुंह में डाल दिया। उसे चखते ही मैं फूट-फूटकर रोने लगी। ममता जी घबरा गईं।
क्या हुआ....रोने क्यों लगी.... क्या तुम्हें मालपुए पसंद नहीं??
मुझे मम्मा की याद आ गई। वो भी मुझे ऐसे ही खिलाती थीं... मैं सिसकते हुए बोली।
अन्नी, मेरा बच्चा....बोलते हुए उनका गला रूंध गया। मेरे माथे को चूमकर उन्होंने ज़ोर से मुझे बांहों में भर लिया। जैसे खुद से दूर न करना चाहती हों और मैं भी फ़िर से छः साल की अन्नी बन गई।
बहुत देर तक वो मुझे ऐसे ही संभाले रहीं। जब मेरा सिसकना बंद हुआ तो उन्होंने अपने हाथों मेरा चेहरा साफ़ किया और बिखरे हुए बाल ठीक किये। तभी मेरी नज़र उनके कोट पर गई जिसे मैंने रो-रोकर गीला कर दिया था।
साॅरी, मेरी वजह से आपकी ड्रेस गंदी हो गई।
कोई बात नहीं बच्चा, इतना भी गंदा नहीं हुआ है कि मेरी अन्नी को सॉरी बोलना पड़े। इस बात से हम दोनों ही मुस्कुरा दिये।
तुमने ये तो बताया ही नहीं कि मालपुए कैसे बने हैं..??
बहुत ही स्वादिष्ट हैं। इन्हें चखकर लगा जैसे अमृत चख लिया हो।
बस-बस, मुझे चने की झाड़ पर चढ़ाने की ज़रूरत नहीं है। इतना सुनकर मैं खिलखिला कर हंस पड़ी। अचानक दिमाग़ ने याद दिलाया कि अभी हंसना भूली नहीं हूँ और मैं हंसते - हंसते चुप हो गई।
क्या हुआ अन्नी, चुप क्यों हो गई बच्चा... तुम्हें पता है, तुम हंसते हुए बहुत प्यारी लगती हो, बिल्कुल गुड़िया की तरह। फिर इतना उदास क्यों रहती है मेरी प्रिंसेस...!!!
हमेशा अपना दर्द छुपा कर रखने वाली मैं, आज पिघलने लगी....
मैं, मम्मा और पापा... हमारा छोटा-सा परिवार था। मेरे दो ताऊजी भी थे जो अपने - अपने परिवार के साथ यहां इंडिया में रहते थे। दरअसल पापा एक साइंटिस्ट थे और हम तीनों हांगकांग में रहते थे। जब मैं पांच साल की थी वहां एक महामारी फैली। देखते ही देखते ये बीमारी कई देशों में फैल गई। लोग मरने लगे। हर तरफ़ अफ़रा-तफ़री का माहौल था। दुनिया भर के वैज्ञानिक उस बीमारी का इलाज ढूंढने की कोशिश कर रहे थे।
मेरे पापा भी इसी कोशिश में लगे थे और कई महीनों की मेहनत के बाद पापा को इसमें कामयाबी मिल भी गई। वो बहुत खुश थे और हम सब भी। अगले दिन जब वो लैब से लौटे तो उनका चेहरा उतरा हुआ था। मम्मा ने पूछा तो पापा ने मेरे सामने कुछ भी न पूछने का इशारा किया। बहुत छोटी थी मैं.... फिर भी पापा की परेशानी ने मुझे परेशान कर दिया था।
रात को मम्मा - पापा की बातों से मेरी नींद खुल गई। पापा मम्मा को बता रहे थे कि उनकी कंपनी उनसे वैक्सीन का फ़ार्मूला चाहती है ताकि उसमें कुछ फेरबदल करके महंगे दामों में बाज़ार में उतारा जाए। इससे कंपनी को बहुत ज़्यादा लाभ होगा। जबकि पापा ने जो वैक्सीन बनाई थी, वो बहुत कम दाम में बाज़ार में आती।
पापा उनकी बात मानने के लिए तैयार नहीं थे इसलिये उनके सीनियर साइंटिस्ट उन्हें धमका रहे थे। पापा को पैसे लेकर मुंह बंद रखने को कहा जा रहा था। ये पापा की सालों की मेहनत का नतीजा था। वो इस तरह के वायरस पर कई सालों से रिसर्च कर रहे थे। मैंने पापा को इतना मायूस पहले कभी नहीं देखा था।
क्यों न हम अपनी बात सीधा यहां की सरकार तक पहुंचाएं। वो ज़रूर समझेंगे - मम्मा ने सुझाव दिया।
ठीक है... मैं कल सुबह ही जाउंगा। अब सो जाओ। पापा मुझे सीने से लगा कर सो गए।
सुबह जब नींद खुली तो मैंने मम्मा को आवाज़ लगाई। जब वो काफ़ी देर तक नहीं आईं तो मैं बाहर निकली। सोफ़ा के पास मम्मा - पापा ज़मीन पर गिरे पडे़ थे। मैं भागकर पास गई तो देखा कि पापा का पूरा चेहरा खून से लाल था और मम्मा का गला खून से सना था। मैंने उन्हें उठाने की बहुत कोशिश की पर वो नहीं उठे.... कहते हुए मैं फिर से सिसकने लगी।
चुप हो जा मेरा बच्चा.... वो मेरे आंसू पोंछने लगीं।
जिस ममता की छांव से मैं महरूम थी, आज मिली तो दिल ने चाहा कि उसे जी भर के महसूस करूं इसलिए उनकी गोद में सर रखकर लेट गई। हम दोनों ही अधूरे थे इसीलिये शायद एक-दूसरे को पूरा कर रहे थे। इन पलों ने हमें सुकून से भर दिया था। वो सुकून, जिसकी हमने उम्मीद ही छोड़ दी थी। वो इतने प्यार से मेरा सर सहला रही थीं कि मुझे नींद आ गई।
अन्नी.... उठ जाओ प्रिंसेस। देखो सुबह हो गई है... एक प्यारी सी आवाज़ मुझे उठा रही थी।
मम्मा.... क्या मैं आपको मम्मा बुला सकती हूँ प्लीज़...!!!
हाँ प्रिंसेज, मैं मम्मा ही तो हूँ तुम्हारी.... मेरा सर सहलाते हुए कहा उन्होंने और मैं बच्चों की तरह उनसे लिपट गई।
तभी मेघना सिस्टर हड़बड़ाते हुए कमरे में आईं। सिस्टर, पूरे देश में कोरोना वायरस की वजह से पंद्रह दिनों का लाॅकडाउन लग गया है।
क्या.... हम मां-बेटी के मुंह से एकसाथ निकला।
✍️✍️ प्रियन श्री ✍️✍️
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Monday, 14 September 2020
🌺🌺 नया जन्म - (भाग 4) 🌺🌺
दो दिन हो गए पर ममता सिस्टर दिखाई न दीं। आमतौर पर वो 3-4 चक्कर लगा ही लेती थीं मेरे रूम के। कहीं मेरा उनकी बेटी के बारे में पूछना उन्हें बुरा तो नहीं लग गया...!!!
मैं भी कितनी बुद्धू हूँ। खुद मुझे पसंद नहीं कि कोई मेरे जीवन की बखिया उधेड़े तो क्या ज़रूरत थी उनके निजी जीवन के बारे में पूछ-ताछ करने की...!!! ये सोचकर खुद पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन फिर ये ख्याल भी मन में आता कि क्या ये इतनी बड़ी ग़लती है...???
एक बेचैनी सी हो रही थी मन में। बिल्कुल वैसे ही जैसे बचपन में सुबह मम्मा को अपने पास न पाकर होती थी। तब ज़ोर - ज़ोर से आवाज़ लगाकर उन्हें अपने पास बुलाती। मम्मा कहीं भी होती, भाग कर मेरे पास आतीं और खूब सारा दुलार करतीं। एक अरसे बाद ये एहसास फिर से मन में जागा लेकिन ये सोचकर खुद को समझाने लगी कि वो भला मेरे लिए ये भाव क्यों रखने लगीं..!!!
इसी उधेड़बुन में थी कि दरवाज़े पर आहट हुई। एकदम से लगा कि ममता सिस्टर होंगी। दरवाज़ा खुला तो देखा, मेघना सिस्टर थीं। मेरी शाम की दवा लेकर आई थीं। अचानक से चेहरे पर आई चमक, उदासी में तब्दील हो गई। जाने कैसे उन्होंने मेरे मनोभाव भांप लिये और हाथ पर लगे वीगो में दवा इंजेक्ट करते हुए कहा - कुछ पूछना है ?
मैं चौंक गई। क्या मेरा चेहरा मेरी बेचैनी बयाँ कर रहा है..!!!
मेरी हाथ की नसों को हल्के - हल्के सहलाते हुए वो मुस्कुराईं।
कुछ कहना चाहती हो..??
जी वो ममता सिस्टर नहीं दिखाई दे रहीं दो दिनों से। वो ठीक तो हैं ना... मेरा मतलब छुट्टी पर हैं क्या ??? मैं एक ही सांस में बोल गई।
सुनते ही वो ज़ोर से हंस पड़ीं।
मतलब उन्होंने तुम्हें भी अपना दिवाना बना लिया। हमारी ममता दीदी हैं ही ऐसी। जो भी उनसे मिलता है, बस उन्हीं का हो जाता है।
मैं अभी भी एकटक उन्हें देखे जा रही थी। वो समझ गईं कि ये मेरे सवाल का जवाब नहीं था।
वो ठीक हैं.... बस थोड़ी उदास हैं। शायद इसीलिए तुमसे मिलने नहीं आईं।
जी धक् से हो गया कि कहीं मेरी ही वजह से तो नहीं..!!! हिम्मत बांध कर बस इतना ही पूछ पाई - क्यों उदास हैं..??
आज उनकी बेटी का जन्मदिन है। हमेशा हंसती-मुस्कुराती रहने वाली ममता दीदी, इन दिनों उदास हो जाती हैं।
मेरी जिज्ञासा ने ज़ोर मारा। कहाँ है उनकी बेटी सिस्टर...??
वो इस दुनिया में नहीं है... एक लंबी सांस भरते हुए मेघना सिस्टर ने कहा।
क्या... कब, कैसे....??? मेरे मुंह से बेसाख़्ता निकल पड़ा।
बहुत छोटी थी, जब पैसों की कमी के कारण उसका इलाज नहीं हो पाया और वो चल बसी।
ममता दीदी ने बहुत दुःख झेले जीवन में... पर ये सबसे बड़ा दुःख था। लेकिन बहुत हिम्मती हैं वो, तभी तो आज यहाँ हैं। अपनी इकलौती औलाद को खो देने के बाद उन्होंने जैसे प्रण ही ले लिया कि वो अपने सामने किसी को भी पैसों की कमी के कारण दम नहीं तोड़ने देंगी। तुम्हारे इलाज का ज़िम्मा भी उन्होंने ही उठाया है।
मैं अवाक् रह गई ये सुनकर। मुझे निःशब्द देख उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा, तब जाकर मुझे कुछ सुध आई।
तुम्हें एक बात बताऊँ.... ममता दीदी इन दो दिनों में भले ही तुमसे मिलने न आई हों, पर ड्यूटी आने के बाद और जाने से पहले दरवाज़े के कांच से तुम्हें दो पल के लिए ज़रूर देखती हैं।शायद कुछ ख़ास लगाव हो गया है उन्हें तुमसे।
मैं इस निगाह से उनकी तरफ़ देख रही थी जैसे पूछ रही हूँ - क्या सच में....!!!!
आज नाईट शिफ़्ट है उनकी। जब वो ओवर लेने आएंगी तो उन्हें बता दूंगी कि तुम उन्हें याद कर रही हो। देखना, बहुत खुश हो जाएंगी.... कहकर मेघना सिस्टर चली गईं।
उनके जाने के बाद मेरी निगाहें सामने घड़ी पर अटक गईं। आज से पहले घड़ी को इतनी गौर से कभी नहीं देखा था। ये सेकेंड की सुई इतने धीरे कब से चलने लगी... और एक मिनट तो जैसे पांच मिनट में बीत रहा था। कब आठ बजेंगें और कब वो दया की मूर्ति मुझे दर्शन देगी...!!!
जैसे - तैसे करके एक घंटा बीता। घड़ी की सुईयों के आठ बजाते ही मेरी आंखें दरवाज़े पर टंग गईं। वो ड्यूटी पर आएंगी तो ज़रूर मुझे देखने आएंगी.... दो पल के लिए ही सही। तभी कांच के उस पार मुझे दो आंखें दिखीं। मुझे अपनी ओर देखते जान वो आंखें पहले तो कुछ पीछे हुईं और फिर ओझल हो गईं। क्या ये वही थीं....!!!!
✍✍️ प्रियन श्री ✍️✍️
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Friday, 4 September 2020
🌺🌺 नया जन्म - (भाग 3) 🌺🌺
कहां खोई हुई हो, देखो तो तुमसे मिलने कौन आया है !!!
वापस हक़ीक़त की दुनिया में खींचती ये आवाज़ थी यहां की सिस्टर इंचार्ज ममता जी की... मेरी सफ़ेद कपड़ों वाली स्वर्ग की देवी। नज़र घुमाई तो देखा, मेरे बाॅस और कुछ सहकर्मी गुलाब के फूलों का गुलदस्ता और कुछ फल लिए सामने खड़े थे।
आपको होश में देखकर बहुत अच्छा लग रहा है वर्ना तो काफ़ी डर गए थे हम सब। अब कैसी तबियत है आपकी..!!! मेरे बॉस रवींद्र नाथ जी ने पूछा।
जी ठीक हूँ... आप सब का शुक्रिया, पर इन सबकी ज़रूरत नहीं थी।
कैसी बात कर रही हैं अनाहिता जी...!!! भले ही आपको ज़्यादा वक्त नहीं हुआ हमारे साथ काम करते हुए, मगर फिर भी आप हमारे कार्यालयी परिवार का हिस्सा हैं।
अब भई हम तो मानते हैं, आपका पता नहीं.... ठहाके गूंज उठे उस नीरस से कमरे में।
चंचला मैडम बिल्कुल सही कह रही हैं। अब बस आप जल्दी से ठीक होकर कार्यालय ज्वाइन कर लीजिए।
सिस्टर, कब तक डिस्चार्ज हो जाएंगी अनाहिता जी... मिलिंद सर ने पूछा।
बस एक हफ़्ते की मेहमान हैं ये हमारे यहाँ। उसके बाद आप अपनी अमानत ले जा सकते हैं।
थैंक्यू सिस्टर, किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो तो प्लीज़ बताईयेगा। अच्छा अनाहिता, हम लोग आते रहेंगे। Get well soon.... रवींद्र नाथ जी ने कहा।
बहुत जिंदादिल लोग हैं, है ना... सबके जाने के बाद सिस्टर ने कहा।
हम्म्म....
तुम इतनी उदास और गुमसुम क्यों रहती हो..???
खुशी किस बात की मनाऊँ सिस्टर...!!!
इतने बड़े हादसे से तुम बच गई। ये क्या कम बड़ी बात है ??
काश कि बचती ही ना....
ऐसा नहीं कहते। ईश्वर ने तुम्हें नया जीवन दिया है तो ज़रूर उसका कुछ मक़सद होगा।
अब तक की ज़िन्दगी तो बेमक़सद ही थी। अब क्या बदल जाएगा...!!!
अभी तुमने ज़िंदगी जी ही कितनी है, जो ऐसा कह रही हो..??
इस छोटे से जीवन में ही इतना सब देख लिया है सिस्टर कि अब और कुछ बचा ही नहीं देखने को। घर - परिवार, नाते - रिश्तेदार.... सबकी असलियत तो जान चुकी हूँ।
ज़िंदगी सिर्फ़ खुद के लिए जीने का नाम नहीं है। उनके लिए जियो, जिनका कोई नहीं है। दुनिया में केवल तुम ही अकेली नहीं हो अन्नी।
अन्नी... आप मेरा ये नाम कैसे जानती हैं ??? इस नाम से तो केवल मम्मा - पापा बुलाते थे मुझे। मेरे मन में उत्सुकता जागी और कईयों सवाल दिमाग में घूम गए।
सिस्टर एक पल को चौंकी फिर शांत हो गईं।
मैं भी मेरी बेटी को प्यार से अन्नी ही बुलाती थी। दरअसल उसका नाम भी अनाहिता ही था।
था मतलब...??? मैंने थोड़ा हिचकिचाते हुए पूछा।
जवाब में सिस्टर बिना कुछ कहे चली गईं और मैं बस उन्हें जाते देखती रही। जाने क्यों इतनी हिम्मत ही नहीं हुई कि उन्हें रोक सकूं। उनकी चुप्पी और उदास होने की वजह पूछ सकूं।
चेहरे पर खूबसूरत मुस्कान सजाए लोग, दिल में कितना दर्द लेकर चलते हैं... कौन जानता है?? सबकी अपनी कोई-न-कोई कहानी है। मेरी खुद की ज़िन्दगी भी तो एक कहानी बन चुकी है........
घर आने के बाद कई दिनों तक मैं इस सदमे में रही। महीनों लग गए, जो हुआ उसे स्वीकार करने में। तब तक मेरी स्थिति चाभी वाली गुड़िया जैसी रही। जैसे - जैसे घर का रूटीन बताया जाता, जानू को बांह में दबाए... वैसे ही करती जाती। बिना किसी सवाल, संशय और शिकायत के। यहां तक कि मेरे दिमाग ने सोचना भी बंद कर दिया था। हालांकि मुझे सामान्य करने में घर के लोगों ने बहुत मेहनत की।
घर.... ये मेरे अनाथाश्रम का नाम था। सिर्फ़ नाम से ही नहीं, वो वाकई घर था। मेरे जैसे कई बच्चों का, जो बेघर थे। बाकी बच्चों जैसी सामान्य तो मैं कभी न हो सकी.... पर हां, उस हादसे से आगे बढ़ने में उन्होंने मेरा बहुत साथ दिया। बहुत कम बोलती थी मैं और घुलती - मिलती भी काफ़ी कम थी। शायद इसीलिए कभी किसी ने मुझे गोद नहीं लिया।
फिर भी कभी किसी चीज़ के लिए मुझे डांटा नहीं गया। मेरा पूरा ख़्याल रखा गया... अच्छी शिक्षा से लेकर हर संभव सुख - सुविधा तक। बहुत धैर्य के साथ उन्होंने मुझे संभाला। मुझमें ये विश्वास जगाया कि मैं भी कुछ हूँ। इस काबिल बनाया कि खुद को संभाल सकूं।
आज सोचती हूँ तो श्रद्धा से आंखें झुक जाती हैं। अगर उन्होंने भी मुझे ठुकरा दिया होता तो मेरा क्या होता....??? क्या मैं भी सड़कों पर भीख मांगती या देह-व्यापार में ढकेल दी जाती...??? इस सोच से ही मेरे रोएँ खड़े हो गए।
✍️✍️...प्रियन श्री...✍️✍️
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Thursday, 27 August 2020
🌺🌺 नया जन्म - (भाग 2) 🌺🌺
कल तक मैं खुद में ही गुम, एक अनजान सी लड़की थी। जिसका इस दुनिया में कोई हाल-चाल तक लेने वाला नहीं था..... नितांत अकेली। पर इस दुर्घटना ने जैसे सब कुछ बदल दिया। तीन दिन की बेहोशी के बाद आया होश, मेरे लिए "नये जन्म" जैसा था। बरसों बाद अपनेपन का एहसास हुआ था, वो भी अनजानों से...
पूरा हॉस्पिटल स्टाफ़ छोटे से बच्चे की तरह मेरी देखभाल करता था और उस प्राइवेट वार्ड के बेड पर निःशक्त लेटी मैं.... सारा दिन इसी सोच में डूबी रहती कि दुनिया में रिश्ते - नातों का क्या मतलब है...!!!
जिनसे ख़ून का रिश्ता था, उनका ख़ून तो सालों पहले ही सूख गया। एक भरे - पूरे घर - ख़ानदान से अनाथाश्रम तक के सफ़र ने मुझे, मुझमें ही कहीं मार दिया था। साथ ही मर गई थीं मेरी सारी संवेदनाएं.....आख़िरी बार तब रोई थी, जब मेरे अपने मुझे अनाथाश्रम छोड़ कर जा रहे थे। तब, जब अपनों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी।
"मुझे छोड़ कर मत जाइए प्लीज़"....
एक छोटी-सी बच्ची, जिसने अपना सब कुछ खो दिया था। गिड़गिड़ा रही थी... उन्हीं अपनों के आगे जो कभी उसे सर-आंखों पर बिठाते थे। समझ ही नहीं पा रही था कि ये क्या हो रहा है उसके साथ.... और क्यों..????
जल्द ही समझ आ गया कि मैं उनके सर का बोझ थी, जिसे वो बड़ी आसानी से उतार कर चलते बने थे। उसके बाद से मैं कभी नहीं रोई, क्योंकि जानती थी... अब कोई चुप कराने और आंसू पोंछने नहीं आएगा। वैसे भी, ये वाला "घर" सिर्फ़ नाम का घर था... जो सर पे छत, तन पर कपड़े और मुंह में निवाले से अधिक नहीं था मेरे लिए।
फिर भी इस बुरे वक्त में अगर कोई मेरे साथ था तो वो थी जानू .....मेरी डॉल। 4 साल की थी जब पापा से ज़िद की थी कि मुझे भी मेरी जानू चाहिए। दरअसल पापा, मम्मा को जानू कहते थे। पूछने पर बताते कि जैसे बेडटाईम स्टोरी के जादूगर की जान तोते में बसती थी, वैसे ही मेरी जान आपकी मम्मा में बसती है। अब तो हक़ीक़त की दुनिया से बेख़बर मैं, पापा की जादूई कहानियों की दुनिया में डूबती - उतराती रहती।
एक दिन फ़्राॅक का कोना पकड़े पापा के सामने खड़ी हो गई।
क्या हुआ प्रिंसेज़...!!! सारी फ़ाइलें एक तरफ़ करते हुए उन्होंने पूछा।
पापा, मेली जान किछमें बत्ती है...???
आप बताओ... वो मुस्कुराए और उल्टा सवाल मुझ पर दाग दिया।
मुजे नई पत्ता... जवाब तो वैसे भी मेरे पास नहीं था।
उदास देखकर उन्होंने मुझे गोद में बिठा लिया। कुछ देर सोचने के बाद मैंने अगला सवाल किया।
आपको आपकी जानू कहाँ छे मिली ??
मेरे पापा लेकर आए थे.... उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा।
मुजे बी मेली जानू चाईये.... आंखों में चमक भरते हुए मैंने कहा।
लेकिन प्रिंसेज़, जानू तो तब मिलती है जब आप बड़े हो जाओ। आप तो अभी बहुत छोटे हो।
बली तो ओ गई ऊं। देखिए.... मैं तुरंत ही गोद से उतरी और तन कर खड़ी हो गई।
अले हाँ, आप तो छच में बली हो गई हैं... पापा ने आंखें बड़ी करते हुए आश्चर्य से कहा।
ठीक है फ़िर, कल आपकी जानू आ जाएगी।
छच्ची... उनके घुटनों पर हाथ रख कर मैंने आश्वासन चाहा।
मुच्ची... मेरे माथे को चूमकर उन्होंने विश्वास दिलाया।
मैं मारे खुशी के पापा से लिपट गई और फिर भागते हुए सीधा मां के पास किचन में गई ये खुशखबरी देने।
अगली सुबह जब नींद खुली तो एक बड़ी-सी गुड़िया मेरे पास लेटी थी.... मेरी जानू।
✍️✍️ प्रियन श्री ✍️✍️
एक नौसिखिया लिखंतु : बचपन से पढ़ने का कीड़ा था मन में इसलिए अख़बार, पत्र-पत्रिकाओं से लेकर माता श्री के उपन्यास तक... सब पढ़ डालते थे। इसी पढ़ने के शौक ने लिखने को प्रेरित किया... ✍️
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Wednesday, 26 August 2020
🌹🌹..मेरे अल्फाज़...🌹🌹
एक नौसिखिया लिखंतु : बचपन से पढ़ने का कीड़ा था मन में इसलिए अख़बार, पत्र-पत्रिकाओं से लेकर माता श्री के उपन्यास तक... सब पढ़ डालते थे। इसी पढ़ने के शौक ने लिखने को प्रेरित किया... ✍️
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Friday, 14 August 2020
🌺🌺 नया जन्म - (भाग 1) 🌺🌺
मेरा सर तेज़ दर्द से फट रहा था... पर चाहकर भी मेरा हाथ सर तक नहीं जा पा रहा था। मेरा पूरा शरीर सुन्न पड़ चुका था। अपनी बची-खुची ऊर्जा समेट कर मैं बस अपनी आंखें ही खोल पाई। अधखुली आंखों के सामने जो सबसे पहले दिखा, वो था गहरा लाल रंग.... यानि कि मेरा ख़ून। बचपन से ही ख़ून देखकर मुझे घबराहट होती थी। चक्कर आने लगते थे... पर आज जैसे कुछ महसूस ही नहीं हो रहा सिवाय दर्द के... ।
मैं.... अनाहिता शर्मा। मेरी नई-नई नौकरी लगी है इस शहर में। नया शहर, नये लोग... और नये रास्ते। ये तो अच्छा हुआ कि रहने के लिए फ़्लैट, मेरे कार्यालय के पास ही मिल गया इसलिए आने - जाने का खर्च बच जाता है। मैं हर रोज़ नये रास्ते ढूंढा करती कार्यालय जाने के... ताकि कोई नज़दीक का रास्ता ढूंढ सकूं।
आज भी एक नये रास्ते से घर लौट रही थी। ज़्यादा चहल-पहल नहीं थी। आम सड़कों की भाग-दौड़ से दूर। मुझे ऐसी शांत राहें हमेशा से पसंद हैं, जिनपे मैं सुकून से चल सकूं।... पर अचानक ही पीछे से एक ट्रक का हार्न सुनाई दिया। मुड़कर देखा तो सांसें थम गईं... ट्रक ऐसे चल रहा था जैसे उसके ब्रेक फ़ेल हो गये हों। मैं तुरंत ही रास्ते से उतर कर सड़क से दूर जाने लगी... पर होनी का लिखा कौन टाल सकता है..!!
उसके बाद मेरी आंखें अब खुली थीं। तभी एक तेज़ रोशनी चमकी। सुना था कि मौत के ठीक पहले ऐसी ही रोशनी दिखाई देती है। दिल बैठ गया इस ख़्याल से। धीरे-धीरे कुछ सफ़ेद साये मेरी ओर बढ़ते दिखे। क्या मेरा अंत समय आ गया है...??? नहीं... अभी मुझे जीना है।
"हे ईश्वर, मुझे बचा लो।" जीवन भर नास्तिक रहने वाली मैं, आज इस आख़िरी वक्त में ईश्वर पर भरोसा कर रही थी। बस..... उसके बाद क्या हुआ, याद नहीं।
इस बार किसी की नर्म हथेलियों के स्पर्श से मेरी आंखें खुली। सामने सफेद कपड़ो में एक देवी नज़र आई। मुझे लगा मैं स्वर्ग पहुंच गई हूँ।
"अब कैसा लग रहा है बेटा....!!!"
एक अर्से बाद ये शब्द सुन कर मन भींग गया।
तुम्हारा एक्सीडेंट हो गया था। सीवियर ब्रेन इंजरी हुई थी... पर 4 डॉक्टरों की टीम ने 7 घंटे तक तुम्हारा आपरेशन किया। और अब तुम ख़तरे से बाहर हो।
क्यों.... मुझ अनाथ का क्या रिश्ता था उनसे जो उन्होंने मुझे बचाने के लिए इतनी मेहनत की..?? मैं बोल तो नहीं पा रही थी पर ऐसे कई विचार मन में आ रहे थे।
तभी डाॅक्टर आये। मेरा चेक-अप किया... और मैं सुन्न पड़ी ये सब देख रही थी। जाने से पहले उन्होंने मेरे सर पर हाथ रखकर कहा - "जल्दी से ठीक हो जाओ।"
ये मेरी श्रद्धा थी या धन्यवाद.... मेरी आंखों से आंसू ढुलकने लगे।
ये वो "वाइट वारियर्स" थे जिन्होंने मौत से जंग लड़के मेरी ज़िन्दगी को जीता था....मेरे लिए...उपहारस्वरूप।
✍️✍️ प्रियन श्री ✍️✍️
एक नौसिखिया लिखंतु : बचपन से पढ़ने का कीड़ा था मन में इसलिए अख़बार, पत्र-पत्रिकाओं से लेकर माता श्री के उपन्यास तक... सब पढ़ डालते थे। इसी पढ़ने के शौक ने लिखने को प्रेरित किया... ✍️
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Thursday, 23 July 2020
🏵️ अयोध्या के राम नेपाली हैं 🏵️
एक नौसिखिया लिखंतु : बचपन से पढ़ने का कीड़ा था मन में इसलिए अख़बार, पत्र-पत्रिकाओं से लेकर माता श्री के उपन्यास तक... सब पढ़ डालते थे। इसी पढ़ने के शौक ने लिखने को प्रेरित किया... ✍️
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Monday, 13 July 2020
🍃🍃... सिंदूर ... 🍃🍃
"विवाह" - एक पवित्र बंधन, जो परस्पर प्रेम और विश्वास की नींव पर टिका होता है। वहीं हिंदू धर्म में "तलाक" को उचित नहीं माना जाता क्योंकि ऐसी मान्यता है कि जोड़ियां ऊपरवाला बनाता है... और ये कोई आजकल का नहीं बल्कि 7 जन्मों का नाता है। किंतु समय के साथ मान्यताएं बदल जाती हैं। आज के युग में तलाक आम बात है। पर कई बार उनके कारण सोचने पर विवश कर देते हैं...
अभी हाल ही में गुवाहाटी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अजय लांबा और न्यायमूूर्ति सौमित्र सैकिया ने तलाक के एक मामले में फ़ैैसला देते हुए कहा कि - "पत्नी का सिंदूर और शांखा पोला पहनने से इंकार करना उसे कुंंवारी दिखाता है। इसका साफ़ मतलब है कि वह अपना विवाह जारी नहीं रखना चाहती।"
आसान शब्दों में अगर कोई विवाहित स्त्री सुहागन होने की निशानियां धारण नहीं करती है तो वो अपनी शादी की इज़्ज़त नहीं करती और उस शादी में नहीं रहना चाहती। ऐसी स्त्री से तलाक लेने को कोर्ट मंज़ूरी देता है। यानि कि सिर्फ़ इस बिनाह पर पति अपनी पत्नी से तलाक ले सकता है और बिना किसी जद्दोजहद के वो उसे मिल भी जाएगा। हालांकि हाई कोर्ट से पहले फ़ैमिली कोर्ट ने पति को जमकर लताड़ लगाई थी और यह कहकर तलाक देने से इंकार कर दिया था कि पत्नी ने उसके साथ कोई क्रूरता नहीं की है।
सिंदूर.... एक ब्याहता की पहचान। हिंदू रीति - रिवाज़ों में सिंदूर की महत्ता किसी से छुपी नहीं है। विवाह की रस्मों में सिंदूरदान एक अहम रस्म है। जहां वर द्वारा वधू की मांग में सिंदूर का भरा जाना एक स्त्री के जीवन का महत्वपूर्ण परिवर्तन है.... अब वह कुंवारी से विवाहित है। कुछ क्षेत्रों में ऐसी मान्यता है कि मांग में जितना लंबा सिंदूर भरा जाएगा, पति की आयु उतनी ही लंबी होगी। ( हांलाकि ये शोध का विषय है। )
केवल सिंदूर ही नहीं बल्कि मंगलसूत्र, पैरों की उंगलियों में पहने जाने वाले बिछुए, पंजाब में हाथों में चूड़ा तो बंगाल और पूर्वोत्तर के कुछ क्षेत्रों में शांखा पोला (लाल - सफेद कंगन).... एक स्त्री के सुहागन होने के द्योतक हैं। सोलह श्रृंगार के अन्य श्रृंगार भले ही न धारण किये जाएं परंतु क्षेत्र विशेष में उपरोक्त को धारण करना आज भी लगभग अनिवार्य है।
यहां काबिलेगौर है कि ये सारे परिवर्तन और श्रृंगार केवल स्त्री के जीवन में होते हैं। निश्चित रूप से आपने कभी किसी पुरुष को सिंदूर, मंगलसूत्र, बिछुए, पायल - चूड़ी या शंखा पोला पहने नहीं देखा होगा। मतलब आप किसी महिला को देखकर आसानी से बता सकते हैं कि वो शादी शुदा है या नहीं... पर शर्त लगा लीजिये कि आप किसी पुरुष को देखकर ये नहीं बता सकते।
अक्सर पुरूषों के बीच सिंदूर और बिंदी को लाल निशान यानि ख़तरे की घंटी कहकर मजाक़ होता है। मतलब यह महिला किसी और की संपत्ति है परंतु पुरूष ऐसी कोई निशानी धारण नहीं करता इसलिए वो किसी की भी संपत्ति नहीं है और वो अपनी इस आज़ादी का फ़ायदा उठा सकता है।
यहां बात पश्चिमी सभ्यता की करें तो उनमें शादी की अंगूठी वर और वधू दोनों धारण करते हैं। जो रिश्तों में बराबरी और साझा ज़िम्मेदारियों को दर्शाता है। पर क्या ये बराबरी हमारे यहां देखने को मिलती है...!!! हमारे समाज की एक मानी हुई बात है कि ये सारी ज़िम्मेदारियां केवल स्त्री के माथे हैं। पति चाहे जैसा हो, शादी निभाने की ज़िम्मेदारी उसकी, ससुराल - मायके की ज़िम्मेदारी उसकी, घर को स्वर्ग - नर्क बनाने की ज़िम्मेदारी उसकी...
अगर इनमें से एक भी चीज़ ग़लत हुई तो पूरा समाज उसके सर पर सवार हो जाएगा। उसके संस्कारों की जमकर लानत - मलानत की जाएगी और किसी को एक क्षण भी नहीं लगेगा उसके चरित्र का परिक्षण करने में...। पर क्या किसी ने एक बार भी गौर किया की पति की ज़िम्मेदारी नाम की भी कोई चीज़ होती है..!! जबकि पति-पत्नी एक ही गाड़ी के दो पहिये हैं, ये बात सबके ज़बान पर होती है।
ऐसे में क्या केवल सिंदूर और शांखा पोला न पहनना इतना बड़ा गुनाह है कि उसकी सज़ा तलाक मुकर्रर की गई...!!! कारण साफ़ है - हमारी सामाजिक व्यवस्था पितृसत्तात्मक है। समय के साथ भले ही स्त्रियों ने अपनी पहचान बनाई और पर्दे की ओट से बाहर निकल कर पुरूषों के साथ कंधा मिलाकर काम करना शुरू किया पर हमारा समाज इसे आज तक पचा नहीं पाया है।
हमारा संविधान सबको बराबरी का दर्जा देता है लेकिन उसे लागू कराने वाले लोग तो इसी पितृसत्तात्मक समाज से आते हैं। फिर चाहे वो कोई राह चलता आदमी हो या न्यायाधीश के पद पर बैठा हुआ व्यक्ति, जो लगभग हर नागरिक की आख़िरी उम्मीद है। कमोबेश सभी इस ग्रंथि से पीड़ित जान पड़ते हैं। वर्ना बजाय इसके कि कोर्ट तलाक का आदेश देती, वो ऐसी व्यवस्था करती जो इस गैरबराबरी को ख़त्म करके देश और समाज को नई राह दिखाती और विवाह जैसी संस्था की गरिमा बहाल करती....
ये आलेख आपको कैसा लगा, अवश्य बताएं। आपकी प्रतिक्रियाएं, आलोचनाएँ एवं सुझाव, सादर आमंत्रित हैं 🙏
✍️✍️ प्रियन श्री ✍️✍️
एक नौसिखिया लिखंतु : बचपन से पढ़ने का कीड़ा था मन में इसलिए अख़बार, पत्र-पत्रिकाओं से लेकर माता श्री के उपन्यास तक... सब पढ़ डालते थे। इसी पढ़ने के शौक ने लिखने को प्रेरित किया... ✍️
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Sunday, 28 June 2020
👨🏿🦳👨🦳👨🏽🦳गुलामी रंगों की👱🏻♂️👱🏾♂️👱🏼♂️
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